चंदौली। उत्तर प्रदेश में बुनियादी शिक्षा को संवारने और कायाकल्प के तमाम दावों की हवा निकालती एक डरावनी तस्वीर चंदौली के प्राथमिक विद्यालय रेवसा झंडा से सामने आई है। यहाँ देश का भविष्य कहे जाने वाले मासूम बच्चे प्रशासनिक उपेक्षा और बेसिक शिक्षा विभाग की घोर लापरवाही के दंश को हर दिन झेलने के लिए मजबूर हैं।

करीब एक साल पहले कागजी कोरम पूरा करते हुए विद्यालय के जर्जर भवन को ध्वस्त तो कर दिया गया, लेकिन नए भवन का निर्माण कराना विभाग शायद भूल चुका है। नतीजा यह है कि विद्यालय में नामांकित 80 नौनिहालों को कक्षा 1 से 5 तक की पढ़ाई मात्र एक छोटे से कमरे में बैठकर करनी पड़ रही है।

पढ़ाई नहीं, मासूमियत का घुट रहा दम
भीषण गर्मी और उमस के बीच एक ही कमरे में ठसाठस भरे 80 बच्चों की सांसें फूलने लगती हैं। जिस कमरे में ठीक से 20 बच्चे भी नहीं बैठ सकते, वहाँ पांच अलग-अलग कक्षाओं के बच्चे एक साथ बैठने को बेबस हैं। एक तरफ से कक्षा 1 का पहाड़ा गूंजता है, तो दूसरी तरफ कक्षा 5 का गणित—इस शोरगुल और अमानवीय माहौल में पठन-पाठन पूरी तरह से मज़ाक बनकर रह गया है।

बेबस शिक्षक, सोता बेसिक शिक्षा विभाग
विद्यालय में इंचार्ज प्रधानाध्यापक विपिन कुशवाहा, सहायक अध्यापक रितु कुमारी, हेमलता वर्मा तथा शिक्षामित्र अक्षय लाल व सुनीता समेत 5 शिक्षकों की तैनाती है। लेकिन बदहाल व्यवस्था के आगे यह शिक्षक भी लाचार नजर आते हैं। जब सिर छिपाने के लिए छत और बैठने के लिए जगह ही न हो, तो गुणवत्तापूर्ण शिक्षा का दावा केवल कागजों तक ही सीमित रह जाता है।

जिम्मेदारों की खामोशी पर उठे गंभीर सवाल:
1. साल भर पहले भवन गिराने के बाद भी नए निर्माण का बजट और फाइल किस दराज में धूल फांक रही है?

2. क्या विभाग किसी बड़े हादसे या बच्चों के बीमार पड़ने का इंतजार कर रहा है?

3. 'सब पढ़ें, सब बढ़ें' का नारा क्या केवल विज्ञापनों तक ही सीमित रहेगा?

यह स्थिति सीधे तौर पर नौनिहालों के स्वास्थ्य, सुरक्षा और भविष्य के साथ किया जा रहा खिलवाड़ है। यदि जल्द ही बेसिक शिक्षा विभाग की नींद नहीं खुली और नए भवन का निर्माण कार्य शुरू नहीं कराया गया, तो मासूमों की शिक्षा और सेहत पर पड़ता यह भारी असर प्रशासन की साख को पूरी तरह कटघरे में खड़ा कर देगा।